Friday, April 13, 2012

ओस जैसी ज़िन्दगी













हरे झुकते पत्तों पे सरसराती सी फिसलन,
घास पे हीरे के जैसे हो रखी,
जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।

तेरा अस्तित्व तेरा वजूद तब दिखता,
जब बूंदों से होती ये ज़मीन पावन।
बिन बारिश न  है तू, जब  होती,
तो पल  में सिमटता तेरा जीवन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।

जिंदगी चाहे छोटी हो,
पर हंसी हरपल  बनी रहे।
कुछ ओस से ही सिख ले,
कि चमक हरपल सजी रहे।
अंततः तुझे जाना है,
रिसते हुए मिटटी के आगोश।
फिर भी जिन्दगी जीना,
तू सिखला जाती ओस।

Saturday, September 17, 2011

बीते पल


अचानक क्यूँ ऐसा मन को हुआ,
क्यूँ ना पुरानी यादों को टटोला जाये|
दोस्तों की पुरानी फोटो और,
स्कूल की पुरानी पुस्तकों को खोला जाये|

यह सब कर,
एक अपनापन सा जगने लगा|
ऐसा पहले भी हुआ है,
न जाने क्यूँ लगने लगा|

सच कहते हैं,
जब कुछ बीत जाये तो,
एक कमी सी लगती है|
तब उसकी कद्र नहीं की,
यह सोच,
आँखों में नमी सी लगती है|

वक़्त हर पल आगे ही क्यूँ जाता है,
सुनहरे बीते पलों को,
फिर से क्यूँ नहीं दिखाता है|
काश वक्त अंगड़ाई लेना सिख ले,
ये सोच,
जिंदगी हसीं सी लगती है|

सच कहते हैं,
जब कुछ बीत जाये तो,
एक कमी सी लगती है|
तब उसकी कद्र नहीं की,
यह सोच,
आँखों में नमी सी लगती है|

Tuesday, May 3, 2011

किसान-एक संवेदनशील जीवन

ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
बंज़र भूमि, बंज़र जीवन,
ज़िन्दगी भी तबाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।

कैसे हो बच्चों की शिक्षा पुरी,
कैसे पुरी हो परिवार की अभिलाषा अधुरी।
खुद मुक्त भी नहीं होती यह जीवन,
मुक्त हो जाए तो होती हमारी चाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।

कोई नेता कहीं अपनी मुर्ति बनवाए,
कोई खेलों से करोड़ों कमाए।
अश्क भी कोई समझ ले,
क्युं नहीं किसी को हमारी परवाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।

Wednesday, February 23, 2011

छात्र संघ

छात्र संघ! आखिर है क्या ये छात्र संघ? क्या यह जिम्मेदार युवाओं का समूह है या फिर दबंग छात्रों का जमावरा जो देश के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझते| दिन प्रति दिन यह काफी जटिल प्रश्न बनते जा रहा है| लोकतंत्र के हर वर्ग के लोगों की छात्र संघ के प्रति अपनी एक मानसिकता है या कह सकते है एक परिभाषा है|

मेरा यह मानना है की शायद सरकार छात्र संघ की शक्ति से खौफ खाती है और समाज छात्र संघ को छात्रों का अपराधीकरण समझती है| इसकी छवि दिन प्रति दिन समाज के हर वर्ग में बिगरती जा रही है और लोगों के मन में एक असत्य मानसिकता घर कर रही है|

प्रथम हम सरकार की बात करते हैं| आज कल राजनीतिक पार्टियाँ विश्वविद्यालयों में घुसकर कुछ छात्रों को भोग-विलास से सम्बंधित प्रलोभन दे कर एक गुट का निर्माण करते हैं जिन्हें स्टुडेंट विंग ऑफ़ ऐबीसी पार्टी का नाम दिया जाता है| इससे छात्रों का विकास नहीं बल्कि विनाश होता है| छात्र हमेशा प्रलोभित वस्तु की वजह से नेताओं के पंजो तले दबे रह जाते हैं और अपराधिक कार्यों से भी संलग्न होने लगते हैं और उन छात्र नेताओं का विकास नहीं हो पाता जिनमें शिक्षा, नेतृत्व और समाज सेवा के गुण हो अर्थात जो सर्वगुण संपन्न हो| छात्रों के इसी रूप को देखकर इनकी सामाजिक छवि बिगरती जा रही है|

मगर छात्र राजनीती का एक दूसरा पहलु यह भी है की लाखों छात्रों में से एक ऐसा छात्र भी होता है जो अपने अथक प्रयास और परिश्रम पूर्ण कार्यों से समाज के नज़र में अपनी एक ऐसी छवि बनाने में सफल होता है जिसे समाज भी स्वीकार करती है पर ये नेता अक्सर किसी न किसी राजनितिक साजिश के शिकार हो जाते है|

पर अब वक्त आ गया है की हम धर्म और जाति से उठकर इनके अस्तित्व को इतना मज़बूत करें की इन्हें कोई साजिश का झोंका छु भी न पाए| ऐसे नेता के निर्माण का अर्थ है समाज का निर्माण और समाज के निर्माण का अर्थ है देश का निर्माण|

Thursday, January 28, 2010

माँ

एक शब्द ही नहीं,
ममता का रूप हो तुम|
हर कदम मिलने वाली,
छाँव और धुप हो तुम|
भर दे जो जीवन को,
जिस प्रेम एवं आशिर्वाद से,
वो एहसास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ ,
की कहीं आसपास हो तुम|

मुश्किलों में तुम हो सहारा,
एक अपना है हमारा|
जिसने ये जीवन सवारा,
वो एहसास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ,
की कहीं आसपास हो तुम|

हमारी नींद जिनकी,
जागती आँखों में सोती|
जो हमारे कष्टों में,
पल-पल रोती|
जन्म ही नहीं,
जीवन भी दिया तुमने|
इसलिए ख़ास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ,
की कहीं आसपास हो तुम|

Wednesday, September 16, 2009

सरहद पार-कैदी की पुकार

भारत के सरहद पार,
सलाखों के पीछे से कैदी की पुकार।
हे! भाग्य विधाता,
क्युं नहीं मेरे भाग्य जगाता।
रोज रात को सोता जब मैं,
रो देता हूँ अक्सर तब मैं।
आंखों से गिरते आँसू की धार,
याद दिलाती है माँ के आँचल का प्यार।
नव प्रभात आता है जब-जब,
आतें है मन में विचार तब-तब।
क्या कोई ऐसी सुबह नहीं हो सकती,
कि मुझे आजादी दिला सकती।
या कोई पवन का झोंका संदेश लिए,
आता किसी शाम।
दिल में होती बेइन्तहा खुशी,
होंठों पर होता पैगाम।
सोच-सोच मन कुंठित होता,
नींद बिना रातों को सोता।
देशों को सरहद ने बांटा,
दिल को क्युं नफरत ने काटा।

Sunday, August 23, 2009

राष्ट्र प्रेम

जब भी देश से सम्बंधित बातें होती हैं या देश का ख्याल इस मष्तिष्क अथवा जुबां पे होता है तो ह्रदय में एक ही जोश-ऐ-जूनून की अनुभूति होती है जिसे बयां करना मुश्किल ही नहीं असंभव है। हमारे जूनून का एक और महत्वपूर्ण कारक हमारा तिरंगा भी है जिसके लिए जितनी भी प्रेम दर्शायी जाए या इज्ज़त समर्पित की जाए कम ही होगी।

हम जिस देश में रहते हैं, उसके लिए ह्रदय में थोरी बहुत तो प्रेम और इज्ज़त होनी ही चाहिए। मेरे इस कथन का तात्पर्य यह है की आज दशक-दर-दशक लोगों की सोच में परिवर्तन होते जा रहा है। आज देश में कई ऐसे लोग और खास कर कुछ युवा हैं जिनके मष्तिष्क के शब्दकोष से राष्ट्र प्रेम, तिरंगे के प्रति इज्ज़त आदि शब्दों और वाक्यों का आभाव होते जा रहा है या है ही नहीं, जो की होना दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं बल्कि ग़लत भी है। मेरे अनुसार राष्ट्र का आदर करना माँ के आदर करने के बराबर है। इसलिए देश के हर नागरिक के ह्रदय में राष्ट्र के प्रति प्रेम और आदर होना अनिवार्य है।

मगर इन तथ्यों से हट कर देश को देखा जाए तो एक और दृश्य हमारे आंखों के सामने प्रस्तुत होता है जिसे हम सब कहते हैं "विविधता में एकता"। यह देश विविधताओं में एकता का प्रतिक है जिसमें विभिन्न धर्म, जाति और भाषाओँ के लोग रहते हैं परन्तु भिन्न होने के बावजूद इस तिरंगे की छाँव में इनकी एकता भी स्वयं प्रदर्शित होते रहती है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपने वाक्यों को विराम देता हूँ।
जयहिंद